Copyright :-

© Renu Mishra, All Rights Reserved

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

उफ़्फ़ !! तू और तेरा इश्क़

 
उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यों कहूँ, कि…
तेरे इक ज़िक्र से मैं
सुबह की तरह उजली हो जाती हूँ 
जाने क्यूँ उड़ती हुई बदली हो जाती हूँ 
कभी सोच के तेरी बातों को 
यूँही खुद में ही हँस लेती हूँ 
कोई आखों से दिल को ना पढ़ ले 
तो नयन भिगो धो लेती हूँ। 

उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यूँ कहूँ, कि 
तेरी फिक्र से मेरा मन 
तूफानों मे फंसी कश्ती हो जाता है 
कोई लुटा-पिटा-सा बस्ती हो जाता है 
कोई जान ना ले व्याकुलता को 
बेमतलब ढोंग रचाता है 
नयनों को तेरा सपन-खिलौना दे 
यूँ खुद को ये बहलाता है । 

उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यूँ कहूँ, कि 
तेरे इश्क़ के इतर से 
मन खुशबू खुशबू हो चुका है 
तन चन्दन-सा खिल चुका है 
तेरे यादों की खुशबू को मैं 
अपने रूह तक बसा बैठी हूँ 
तुझे पाने की ख़्वाहिश मे 
खुद को कब से भुला बैठी हूँ । 

(प्रस्तुत कविता-मेरे साझा काव्य-संग्रह "विरहगीतिका" से )

काश!! वो आ जाए....


चाक चौबारे धुल के बैठी
शायद कहीं से वो आ जाए...
नयन-झरोखा  खोल के बैठी
मन के अंतस में खो जाए!!

ख्वाहिश नहीं मेरी बिंदिया निहारे
बैठा रहे मेरे पहलू में.…
बस चाहती हूँ, जब दिल ये पुकारे
सौ जतन करके भी आ जाए!!

ख़ुद से नहीं, तुमसे प्यार किया है
ये कैसे तुम्हें ऐतबार हो....
एक बार तुम मेरी रूह में झाको
शायद तुम्हें अपना दीदार हो जाए!!

मिलने को तुमसे कितने जतन किए 
जैसे प्यार ना हो के, कोई व्यापार हो 
दूरियों की कमज़ोरी मिटा के देखो 
मेरा नन्हा सपना साकार हो जाए !!

बहुत तड़पाया मन को तुमने 

हाथों पे रखे अंगारे सा...
कुछ ऐसे मिलो तुम आके साथी 
जलते मन की प्यास बुझ जाए !!

(प्रस्तुत कविता-मेरे साझा काव्य-संग्रह 
"विरहगीतिका" से )  



सोमवार, 18 नवंबर 2013

“रुक जाती है ज़िंदगी’’



किसी ने कहा मुझसे...
“ज़िंदगी कहाँ रुकती है
किसी के चले जाने से
किसी के खो जाने से
किसी के यादों मे समा जाने से...
वो तो यूंही चलती है
जैसे
उससे कुछ छूटा ही नहीं
उसका कोई खोया ही नहीं
वो कुछ भूल पायी ही नहीं।’’
..................................................
मैं बस इतना कहूँगी
तुम्हें क्या पता, तुम क्या जानो
ज़िंदगी कैसे रुकती है
किसी के चले जाने से....
................................................
ऐसा लगता है....  
जैसे आगे कोई मोड ना हो
सड़क के मुहाने पे
बस एक खाई हो गूँजती हुई
लगी हो उसके यादों को दोहराने मे....
  
कोई ख़ामोशी की अंधेरी सुरंग
के उस पार से
तुम्हें पुकार रहा हो और
तुम पहुँच ना पाओ उस ठिकाने पे.... 

लगता है कोई झट से बुलाएगा
किसी बहाने से
और छोड़ जाएगा रजनीगंधा के फूल
बिस्तर के सिरहाने पे.....  

या कभी कोई यूं ही खुश होगा
तुम्हें नज़दीक पाके बुदबुदाने से 
और कभी आती रहेगी उसकी सदा
किसी बीते हुए ज़माने से....

कभी लगता है सतायेगा कोई
भीगे बालों को सहलाने से
या कर जाएगा मन अधीर
अपने गाये हुए तराने से....
.............................................  
वो सब रह जाएगा तुम्हारे पास
जो उसके लिए तुमने माँगा था
वो दौलत-शोहरत वो दुनिया का बाज़ार
पर वो ना होगा जिससे तुम्हारा नाता था
एक पल को ही सही
रुक जाती है ज़िंदगी, थम जाती है साँसे
ये सोच के कि
अब वो ना आएगा तुम्हारे लाख बुलाने पे
वो जो रूठा तो ना माना तुम्हारे मनाने से  
अब ना कहना कि
ज़िंदगी कहाँ रुकती है
किसी के चले जाने से
क्यूंकि....  
मैंने देखा है वो आलम,
उसे रूह से महसूस किया है
ना चाहते हुए भी,
उन हालातों को बदस्तूर जिया है।
फिर भी ना यकीं हो तो
एक काम करना....
मुझे चले जाने दो, खो जाने दो  
और ना याद करो किसी बहाने से
फिर देखो रुकती है कि नहीं
ज़िंदगी....किसी के चले जाने से!!

रविवार, 22 सितंबर 2013

मैं और मेरा चाँद!!



कल रात बड़ी ख़ामोश थी 
उसे बदली के संग लुकते-छिपते देख
सोच रही थी.….
क़ाश !! वो दूर होके भी, मेरे पास रहे 
मेरे जज़्बातों का राज़दार रहे।
जी करता था, बस देखती रहूं उसे 
इक टक.… 
भर लूं अपनी आँखों में और कहूं 
कहीं मत जा…

रात बीत जाए तो भी नहीं 

बात बीत जाए तो भी नहीं…. 
और कह दूं… 
तू बादलों में छुप जायेगा,
तो भी मेरा रहेगा।.…
जब धुंधला हो खो जायेगा,

तो भी मेरा ही रहेगा । 
तेरे अँधेरों-उजालों की परवाह नहीं 
इस मासूम इश्क़ की कोई दवा नहीं। 
तेरे उजले अहसासों से,ये दिल लबरेज है.… 
तू कोई चाँद नही, कोई रंगरेज़ है । 
जिसने रंग के भिगो दिया है मुझे
अपने कहे-अनकहे दिल की बातों से
जिसने सँवार दिया है मुझे
अपने मदभरी सुरमई रातों से 
अब !!
तेरे उजालों से मेरे रात-दिन रोशन रहेंगे 
तू मेरा नहीं,फिर भी तुझे अपना कहेंगे 
तुझे मंज़ूर हो तो भी 
तुझे गुरेज़ हो तो भी। :)

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

खुल के मुस्कुरा ज़रा :)





                      

खुल के मुस्कुरा ज़रा, ख्वाब तू नए से बुन..
धड़कने जो गा रही,सुन ले उनकी मीठी धुन
|
आँखों की खामोशियों में इक हया,इक शर्म है
 तितलियों के पंख से ,उसमे ख्वाब कितने नर्म हैं,
कोई चुरा ना ले उसे,दिल की ये गुज़ारिश सुन
खुल के मुस्कुरा ज़रा, ख्वाब तू नए से बुन|

ख्वाहिशों को, चाहतों को, मिल गयी उड़ान है.
'कल' तो थी कल की बातें,ये 'आज' तेरी पहचान है.
ज़िन्दगी को जी अभी तू,उसका नया संगीत सुन,
खुल के मुस्कुरा ज़रा, ख्वाब तू नए से बुन|

खुल के मुस्कुरा ज़रा,ख्वाब तू नए से बुन|
धड़कने जो गा रही, सुन ले उसकी मीठी धुन|"

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

इक अर्ज़ी है तुमसे …

 
 मेरा दिल काँच सा टूट गया है
एक टुकड़ा आके चुभ-सा गया है
जो खुद को खोया, उसको पाया
अब वो ही मुझसे गुम सा गया है.

काश वो समझे, काश वो जाने
दिल का टूटना होता क्या है
सौ टुकड़े हो के भी, उसको पुकारे
वो कौन सा मंतर फूँक गया है .

इश्क़-समंदर बाद की बातें
चाहत की दरिया में उतरो तो जाने
वो कश्ती अब क्या दरिया में उतरे
जिसका माझी ही रूठ गया है.

जो तुम रूठे हो तो मना भी लें
ना मानो तो तुम्हें सता भी लें
पर कैसे समझाएं तुमको,
तुम्हारे दिल का इक टुकड़ा …
हमारे अनकहे जज्बातों का ,
मिलते जुलते खयालातों का ,
तुम्हारे उन रौशन सवालातों का ,
मेरी दिल्लगी भरी जवाबी रातों का…
मुझमें ही कहीं छूट गया है .

हो सके तो आके ले जाना…
तुम्हारा जो मुझमे छूट गया है
और कर जाना मुझे बिलकुल खाली, 
छोड़ जाना मुझे बिलकुल तन्हा ….
सोच लूंगी…कोई अपना ही, मुझे लूट गया है :(


by :-
रेनू मिश्रा




शनिवार, 15 दिसंबर 2012

जाने क्यों...













 " जाने क्यों, उस राह पे चल पड़े क़दम।
  जबकि जानती हूँ, तू उस राह का...
  ना साथी होगा, ना हमदम।।

  कभी इंतज़ार के कांटो से,
  छलनी होगा ये मन 
  या फिर
  कभी तन्हाईओं के पत्थरों से...
  ज़ख़्मी होगा ये तन।
  पर सुकूँ होगा कि,
  दिल से तेरे प्यार का दर्द,
  ना हो सका कम।।

  सौ दर्द मिले, या मिले...
  रुसवाईयों  का गम,
  बस तेरे इश्क़ का जुनूं रहे...
  फिर चाहे आँखें, रहें नम।
  इक उफ़्फ़ जो किया तो,
  साँसों की दिल से...
  टूट जाएगी कसम।।

  इस अल्हड़-सी कसम को,
  हम निभाएंगे हर जनम।
  क्यूं कि, तेरे इश्क़ में...
  लुटना, मिटना, मरना...
  मेरा अपना है करम।  
  फिर चाहे तू माने, तेरे लिए...
  मेरा, ये प्यार सच्चा,
  या झूठा-सा भरम।।