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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

उफ़्फ़ !! तू और तेरा इश्क़

 
उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यों कहूँ, कि…
तेरे इक ज़िक्र से मैं
सुबह की तरह उजली हो जाती हूँ 
जाने क्यूँ उड़ती हुई बदली हो जाती हूँ 
कभी सोच के तेरी बातों को 
यूँही खुद में ही हँस लेती हूँ 
कोई आखों से दिल को ना पढ़ ले 
तो नयन भिगो धो लेती हूँ। 

उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यूँ कहूँ, कि 
तेरी फिक्र से मेरा मन 
तूफानों मे फंसी कश्ती हो जाता है 
कोई लुटा-पिटा-सा बस्ती हो जाता है 
कोई जान ना ले व्याकुलता को 
बेमतलब ढोंग रचाता है 
नयनों को तेरा सपन-खिलौना दे 
यूँ खुद को ये बहलाता है । 

उफ़्फ़ !!
क्या कहूँ, क्यूँ कहूँ, कि 
तेरे इश्क़ के इतर से 
मन खुशबू खुशबू हो चुका है 
तन चन्दन-सा खिल चुका है 
तेरे यादों की खुशबू को मैं 
अपने रूह तक बसा बैठी हूँ 
तुझे पाने की ख़्वाहिश मे 
खुद को कब से भुला बैठी हूँ । 

(प्रस्तुत कविता-मेरे साझा काव्य-संग्रह "विरहगीतिका" से )

काश!! वो आ जाए....


चाक चौबारे धुल के बैठी
शायद कहीं से वो आ जाए...
नयन-झरोखा  खोल के बैठी
मन के अंतस में खो जाए!!

ख्वाहिश नहीं मेरी बिंदिया निहारे
बैठा रहे मेरे पहलू में.…
बस चाहती हूँ, जब दिल ये पुकारे
सौ जतन करके भी आ जाए!!

ख़ुद से नहीं, तुमसे प्यार किया है
ये कैसे तुम्हें ऐतबार हो....
एक बार तुम मेरी रूह में झाको
शायद तुम्हें अपना दीदार हो जाए!!

मिलने को तुमसे कितने जतन किए 
जैसे प्यार ना हो के, कोई व्यापार हो 
दूरियों की कमज़ोरी मिटा के देखो 
मेरा नन्हा सपना साकार हो जाए !!

बहुत तड़पाया मन को तुमने 

हाथों पे रखे अंगारे सा...
कुछ ऐसे मिलो तुम आके साथी 
जलते मन की प्यास बुझ जाए !!

(प्रस्तुत कविता-मेरे साझा काव्य-संग्रह 
"विरहगीतिका" से )