Copyright :-

© Renu Mishra, All Rights Reserved

गुरुवार, 21 मई 2015

जन्मदिन मुबारक हो...लम्हों के मुसाफिर...

दोस्तों, आज आप सब को ये बताते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही है कि आज मेरे ब्लॉग "लम्हों के मुसाफिर..." को पूरे पांच साल हो गए। यानि आज आपके अपने ब्लॉग का 5वां जन्मदिन है... हुररै...
इन पांच सालों में ये मेरा हमसफ़र कभी कम चला तो कभी ज़्यादा, मगर रुका कभी नहीं। हमेशा मुझे आगे बढ़ते रहने को उत्साहित करता रहता है। एक बार जो आज से पांच साल पहले इसके प्यार में पड़ी कि अब तक निकल ही नहीं पायी। शायद कभी निकलना चाहा ही नहीं और ना ही कभी निकलना चाहूंगी। अब तो, इसके साथ यूँही लम्हा-लम्हा गुज़रते हुए साँसों की डोरी के उस पार जाना है।
इन पांच सालों में मेरे ब्लॉग पर आने वाले देखे-अनदेखे सभी दोस्तों का दिल से शुक्रिया जिन्होंने अपने प्राइसलैस कमेंट्स से ना केवल मुझमें और लिखने का उत्साह भरा बल्कि मेरे इस सफ़र को भी एक अनोखे अपनेपन से गुलज़ार रखा।
तो चलिए, इस खूबसूरत लम्हों के साझेदार बनते हुए कहते हैं

" जन्मदिन मुबारक हो...लम्हों के मुसाफिर..."

तुम हमेशा यूँही कुछ कहते चलो, कुछ सुनते चलो...ये ज़िन्दगी लम्हों का सफ़र है, गुज़रते चलो...

||विस्थापन||











अपनी ही धरती पर 

विस्थापन का दंश सहता
काले कीचट कपड़ों में लिपटा
कोयला निकालता आदमी
खोजता है 
अमावस की रात सी अंधेरी खदान में 
पूर्णिमा के चाँद सा गोल
रोटी का टुकड़ा


कमज़ोर हाथों से करता है

बार-बार हथौड़े की चोट  
धरती के सीने पर,
क्योंकि उसे याद आता है 
भूख से बिलबिलाते अपने बच्चों का चेहरा
जिनके पेट में दहक रही है
सदियों से जलती कोयले की अंगीठी
लेकिन बस, नहीं है तो
अदहन देने के लिए मुठ्ठी भर अनाज


दिन भर की मेहनत के बाद

मिलती है उसे 
पलकों पर झर-झर के उतरती
कोयले की धुंध वाली सफ़ेद साँझ
और, उसके हाथों पर रख दी जाती है 
लाचार सी आधी-पौनी दिहाड़ी
जो अपने मालिक से 
जिरह करने में भी सहमती है


काले कोयले के काले धन से 

उजले हो जाते हैं सफ़ेदपोश
और छोड़ जाते हैं 
कोयले की कालिख 
उसके हाथों की लक़ीरों में 
धरती की गोद में जाकर भी
भूखा ही रहा आदमी!!


गुरुवार, 14 मई 2015

|| नितांत अकेली ||

दोस्तों, मुझे यह बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि...अभी हाल ही में जानी मानी पत्रिका "कादम्बिनी" के मई-2015 अंक में मेरी कविता " नितांत अकेली" का प्रकाशन हुआ। पढ़ कर अपनी राय अवश्य बताएं...

















|| नितान्त अकेली ||

पहले जब तुझे जानती नहीं थी
सुनती थी तेरी हर एक बात
तेरे इशारों पर चला करती थी
जो कहना मानती थी तेरा
तो खुश रहने जैसा लगता था
ओ मेरी रूह,
कितना दबाव था तेरा मुझ पर

लेकिन एक दिन
मैं हो गयी विद्रोही
लोग मनमन्नी कहने लगे
तुझे जानने की कोशिश में
पहचान गयी खुद को
आदेशों के सांकलों में बाँध के
कोशिश भी की तूने रखने की
मगर मैंने एक ना सुनी
सारी रिवाज़ें रवायतें तोड़ भाग निकली
दुखता था दिल
कांपता था शरीर
दफ़्न होती जाती थी धड़कनें
मगर मैं भागती रही
नापती रही साहस के पहाड़ों को
तैरती रही दरिया के रौ के विरुद्ध
और छिपाती रही खुद को
बस अपने लिए खोज के निकाले गए
समय के घने वीरान जंगल में

मैं जान रही थी कि
तू खोज रही होगी मुझको
लेकिन मैं जानती हूँ ना
कि मैं कहाँ पाना चाहती थी तुझको
अब ना तेरे सुख का कोई गीत
या विचारों की प्रतिध्वनि
मुझ तक पहुँचती है
और ना तेरे विश्वास की कोई कड़ी
या नियम की कोई ज़ंजीर
मुझे गहरे तक जकड़ती है
तुझे खुश रखने की आकांक्षा भी
अब कहाँ बची है मुझमें?
अब मैं भगोड़ेपन के सुकून में जी रही हूँ
अलमस्त, बेलाग, नितांत अकेली!!

(रेणु मिश्रा)