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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

इंतज़ार में......


शाम की छाँव में....
हिलती टहनियों पर पड़े अपने घोंसले की ओर

पक्षियों के झुरमुट को जाते देखती हूँ....

दिल एकदम से पूछ बैठता है.....

तुम कब आओगे ????


रात की चांदनी में....

सरकते बादलों को चांदनी की ओर

तेज़ कदमो से ढकते देखती हूँ ...

दिल एकदम से पूछ बैठता है....
तुम कब आओगे????


सुबह की अधखुली पलकों से ....

अपने हाथों की लकीरों की ओर

देखके जब भी माथे की लकीरों से जोडती हूँ....

दिल एकदम से कह उठता है....

अब तो जाओ.....


ये दिन ये रात....ये पल ये लम्हे

तेरे बिना ऐसे ही सूने हैं......

जैसे अधखिली कली...भँवरे के बिना....

बाट जोहते नयन....संवरे बिना....

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

कुछ ऐसे ही...बस तेरे लिए


तुम्हारे लिए कुछ दिल की बातें, कुछ सौगातें लिख लायी हूँ ...चाहो तो कागज़ के मामूली टुकड़ा समझ लेना या फिर इस अफसाने को दिल की किताब में बंद कर लेना.......
१-"ज़िंदगी से अब कुछ नहीं ...बस साथ रहने की मोहलत चाहती हूँ ,
हीरे - मोती सब लुटा दूं तुमपे ...बस तेरे प्यार की दौलत चाहती हूँ
तेरे ना होने का एहसास ही ...दिल में सिहरन के लिए काफी है ,
साथ तेरे गुज़रे हर लम्हा मेरा .... ज़िन्दगी से ये ही दुआ मांगती हूँ ।"
२-"दिल में कुछ उदासी थी, तेरे लिए एक हंसी हँस दिए ,
चाहते थे कहीं और जाना ..पर कदम तेरी ओर चल दिए ,दिल में कोई बात थी,कहना था ,पर लब क्यूँ सिल गए ,ज़िन्दगी से क्यूँ जुदा हैं , ये ज़िन्दगी के फलसफे ....."


३-"जब भी अक्स तेरा ,किसी चेहरे में देखती हूँ ...
तू रहता है कहाँ , उससे तेरा पता पूछती हूँ ...
ना जाने दिल इतनी बेकरारियां सहता क्यूँ है ..
जब कि वो जनता है तू मुझमे और मैं तुझमे हूँ ..........
"

४-"ना देखो ज़माने के रंग -ओ -ढंग
ना सीखो दीवाने से दिल की बातें ....
अब कहाँ दिखते हैं उल्फतों में रंग
अब कहाँ मिलती हैं प्यार की सौगातें "



५-"तुम कुछ ना कहते थे तो भी हम सुन लेते थे
अब जज्बातों में वो करामात नहीं, तुम्हारे बिना ...
हमें तन्हाई का भी ग़म नहीं, तुम ख्यालों में साथ थे
अब तो भीड़ में भी हैं अकेले....तुम्हारे बिना "



-"ज़िन्दगी में तेरे बिना एक कमी सी थी
अब
तू है तो...एक रौनक है , जश्न है ...
सजी
दिल की महफ़िल है .....
बे
-मंजिल ही तय कर लेते,
हम ज़िन्दगी का सफ़र....
अब
तू ही रास्ता, तू ही सफ़र ...
तू ही मेरी मंजिल है ...............
:)

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नया सफ़र .....


ज़िन्दगी, फिर नए सफ़र पर चल निकली....

जैसे मुट्ठी की रेत हाथ से फिर फिसली

यूँ तो फासले की कोई वजह नहीं तेरे मेरे दरमियाँ

वो तो एक बात थी, जो बन गयी है तितली

फिर नए रास्ते, नयी मंजिल, नया कारवां...

जैसे नदिया, सागर से मिलने फिर हो निकली

कहते हुए सुना है कि 'अंत भला तो सब भला '

पर उस दरम्या, हमने ज़माने की सच्चाई जान ली

मैं चली थी मन के केनवास पर स्याह लकीरें खींचने

पर मेरी तो ज़िन्दगी ही, इन्द्र-धनुषी कूंची निकली

तेरे आने की आहट से,बादल छट गए उदासी के

मौसम में रंगीनियत थी, धूप भी उजली निकली

संग तेरे, ज़िन्दगी का हर सफ़र आसान है

ज्यूँ लगे कि बदली में ,तारों की बारात हो निकली