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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

अपने अनकहे जज़्बात !!















किसी दोस्त के अनकहे जज़्बातों को बयां करने की कोशिश मे...
मेरी नयी कविता
अर्से बाद तुम्हारी ग़ज़ल पढ़ी अखबार में
कोई नासूर सा दर्द उभर आया ख्याल में
मन सहसा ही अकुलाने लगा
कोई अनकहा लम्हा याद आने लगा
कोई बाहर मन के देहरी से
ख्वामख्वाह किसी को बुलाने लगा


 याद आने लगे वो सुनहरे दिन
वो तेरे मेरे सपनों से सजी चमकीली रातें 
जहाँ तेरे हौसलों की उड़ान पर
मेरी ख्वाहिशों की पतंगे
कर आती थी ऊँचे आसमा से बातें
हाँ वहीं कहीं मेरे सपने
आकाँक्षाओं के पार
ऊँचे अम्बर पर बसते थे
और तेरे सपने, मेरे नयनों के सागर में
डूब के पार उतरते थे।

तेरा मूक समर्पण, मेरी इच्छाओं को
शायद मैं कभी ना समझ पाई
मेरे राह के कांटे चुनने वाले
हमराह पथिक से ना मिल पायी
जीवन को नए कलेवर में पा
मैं खुद को उसमे भुलाने लगी
तेरे नेह-मेह की अबूझ पहेली को
बिन सुलझाये आगे जाने लगी।

दिन कटते गए रातें पटती गयी
मैं अपनी छोटी सी दुनिया में सिमटती गयी
ना तुम याद रहे, ना मौसम, ना बातें
आकांक्षाओं के इरेज़र से यादें मिटती रहीं
पर आज ग़ज़ल पढ़ी तो लगने लगा
कैसे नावाकिफ़ रह गयी तुम्हारे जज्बात से
जो मेरे हाथ लगी होती
तुम्हारे मन की डायरी
तो ना रूबरू होते हम ऐसे हालात से !!
...........................................................(रेनू मिश्रा )

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

कुछ ऐसे ही...बस तेरे लिए


तुम्हारे लिए कुछ दिल की बातें, कुछ सौगातें लिख लायी हूँ ...चाहो तो कागज़ के मामूली टुकड़ा समझ लेना या फिर इस अफसाने को दिल की किताब में बंद कर लेना.......
१-"ज़िंदगी से अब कुछ नहीं ...बस साथ रहने की मोहलत चाहती हूँ ,
हीरे - मोती सब लुटा दूं तुमपे ...बस तेरे प्यार की दौलत चाहती हूँ
तेरे ना होने का एहसास ही ...दिल में सिहरन के लिए काफी है ,
साथ तेरे गुज़रे हर लम्हा मेरा .... ज़िन्दगी से ये ही दुआ मांगती हूँ ।"
२-"दिल में कुछ उदासी थी, तेरे लिए एक हंसी हँस दिए ,
चाहते थे कहीं और जाना ..पर कदम तेरी ओर चल दिए ,दिल में कोई बात थी,कहना था ,पर लब क्यूँ सिल गए ,ज़िन्दगी से क्यूँ जुदा हैं , ये ज़िन्दगी के फलसफे ....."


३-"जब भी अक्स तेरा ,किसी चेहरे में देखती हूँ ...
तू रहता है कहाँ , उससे तेरा पता पूछती हूँ ...
ना जाने दिल इतनी बेकरारियां सहता क्यूँ है ..
जब कि वो जनता है तू मुझमे और मैं तुझमे हूँ ..........
"

४-"ना देखो ज़माने के रंग -ओ -ढंग
ना सीखो दीवाने से दिल की बातें ....
अब कहाँ दिखते हैं उल्फतों में रंग
अब कहाँ मिलती हैं प्यार की सौगातें "



५-"तुम कुछ ना कहते थे तो भी हम सुन लेते थे
अब जज्बातों में वो करामात नहीं, तुम्हारे बिना ...
हमें तन्हाई का भी ग़म नहीं, तुम ख्यालों में साथ थे
अब तो भीड़ में भी हैं अकेले....तुम्हारे बिना "



-"ज़िन्दगी में तेरे बिना एक कमी सी थी
अब
तू है तो...एक रौनक है , जश्न है ...
सजी
दिल की महफ़िल है .....
बे
-मंजिल ही तय कर लेते,
हम ज़िन्दगी का सफ़र....
अब
तू ही रास्ता, तू ही सफ़र ...
तू ही मेरी मंजिल है ...............
:)