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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

इंतज़ार में......


शाम की छाँव में....
हिलती टहनियों पर पड़े अपने घोंसले की ओर

पक्षियों के झुरमुट को जाते देखती हूँ....

दिल एकदम से पूछ बैठता है.....

तुम कब आओगे ????


रात की चांदनी में....

सरकते बादलों को चांदनी की ओर

तेज़ कदमो से ढकते देखती हूँ ...

दिल एकदम से पूछ बैठता है....
तुम कब आओगे????


सुबह की अधखुली पलकों से ....

अपने हाथों की लकीरों की ओर

देखके जब भी माथे की लकीरों से जोडती हूँ....

दिल एकदम से कह उठता है....

अब तो जाओ.....


ये दिन ये रात....ये पल ये लम्हे

तेरे बिना ऐसे ही सूने हैं......

जैसे अधखिली कली...भँवरे के बिना....

बाट जोहते नयन....संवरे बिना....

8 टिप्‍पणियां:

  1. Simply superb Renu! Wow! As always, you have composed yet another beautiful poem truely reflective of the depth of your thoughts & most appropriate expressionsve talent! God bless you!

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  2. u really write truely awesum with alot of truth n purity in ur thoughts keep it up :)

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  3. you have made the 'waiting' a little less burdening....

    excellent renu :)

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