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रविवार, 8 मार्च 2015

आज तक न्यूज़ चैनल पर मेरी कविता

दोस्तों अभी खुशखबरी मिली कि मेरी नयी कविता "Happy Women's Day" को आज तक की वेबसाइट पर साझा किया गया है...पढ़ें और बताएं कैसी लगी 😊
http://m.aajtak.in/story.jsp?sid=802391

*******हैप्पी वीमेन'स् डे*******










हर दिन सुबह आँख खोलते ही
निहारती हैं हम हथेलियों को
देखती हैं अपने किस्मत की रेखा
जाने रात भर में 
क्या बदल गया होगा
बदलता कुछ नहीं
पैरों में वही चकर घिन्नी लगी है
जो पैदा होते वक़्त 
धरती माँ से खोइन्छे में मिली थी

रोबोट की तरह 
सेट हो चुका है अपना माइंड सेट
अब उसी कण्ट्रोल बटन से चलता है
अपने जीवन का कारोबार
इसलिए कभी कभी याद भी नहीं रहता
अगले दिन इतवार है या सोमवार
तो भला कैसे याद रहेगा
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का त्योहार
जिसमे हमें याद दिलाया जाता है
कि हमें भी हैप्पी होना है
साल के तीन सौ पैंसठ दिनो में से
अब भला कैसे याद रहे 
अदना सा 8 मार्च का एक दिन 
जबकि इस दिन अपने परिवार में से
किसी का जन्मदिन भी तो नहीं पड़ता
और ना ही होता है
दीवाली, ईद, गुरु-पूरब, ईस्टर
या कोई राष्ट्रीय त्योहार

आज भी 
स्कूल की किताबों में नहीं होता
वुमन के हैप्पी होने का कोई चैप्टर
वो मर्दानी झाँसी की रानी हो सकती है, 
या हो सकती है 
ममता की नदी सी मदर टेरेसा या
करुणा की लौ लिए नाईट-एंगल
बाजू का दम दिखाती मेरीकॉम या
उड़नपरी पी टी उषा हो सकती है
वो हो सकती है 
पुचकारने वाली माँ, 
लाड दिखाने वाली बहन
प्यार लुटाने वाली पत्नी
और ख़याल रखने वाली बेटी या बहु

लेकिन नहीं हो सकती तो बस
खुल कर आज़ाद ख़यालों से
ज़िन्दगी जी लेने वाली आम लड़की
थोपी हुई सोच की दल-दल से निकल कर
खुली हवा में सांस लेने वाली स्त्री
लिंगानुपात की ही तरह
इसे भी महिला दिवस का नाम देकर 
एक दिन में समेट दिया गया है
जहाँ हम उसी रोबोटिक माइंड सेट की तरह
उस दिन खुश हो जाते हैं
रटे-रटाये ज़ुबान से कहते हैं
'हैप्पी वीमेन'स डे'

(रेणु मिश्रा)

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

माँ तुम्हारा जाना...


माँ तुम्हारा जाना
ज्यों नर्म बचपन का खो जाना
सहसा नए कोपल से
कोमल हृदय का
जड़ सा कठोर हो जाना

माँ तुम्हारा जाना 
दुख की तपती दोपहरी मे
या भादों-सी आँखों की बदरी मे
ज्यों सर के ऊपर से,
ममता का छप्पर उठ जाना

माँ तुम्हारा जाना 
खोलनी हो कोई गाँठ मन की
या बाँटना हो कोई दर्द जीवन का
मन की गति से पहुँचे
उन संदेसों का
बैरंग पाती हो जाना  

माँ तुम्हारा जाना
मन मे गहरे फैले रिक्तता का
अति---रिक्त हो जाना!!






सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

**तेरे साथ मद्धम मद्धम**
















        कुछ जागी सी ज़िंदगी मे, गाती सी ज़िंदगी है
तेरे साथ मद्धम मद्धम, गुनगुनाती-सी ज़िंदगी है।

कुछ रंगों की बारिशें हैं, कुछ भीगी सी ख्वाहिशें हैं
अरमानों के सतरंगी उड़ान पे, इतराती-सी ज़िंदगी है।

साँसों पे दम-ब-दम पहरा है, वक़्त भी कहीं ठहरा है
धडकनों के मखमली बिछौने पे, फंतासी-सी ज़िंदगी है। 

कुछ रंजिशें हैं जहान की, कुछ बंदिशें हैं ज़ुबान की
फिर भी तेरे ज़ुर्रत-ए-इश्क़ से, इठलाती सी ज़िंदगी है।

कुछ मोहलतों की गुंजाइशें, कुछ सोहबतों की गुज़ारिशें

तुम संग हर लम्हा ख़र्च करने को छटपटाती-सी ज़िंदगी है।  

**ज़िंदगी की किताब**


दोस्तों, आज काफी दिनों के बाद ज़िंदगी की उलझनों से अपने लिए फुर्सत निकाल पायी और आपके लिए अपने साझा काव्य संग्रह 'धूप के रंग' से पसंदीदा कविता 'ज़िंदगी की किताब' चुन लाई। इस कविता मे किस तरह धूप के रंग की तरह रिश्तों के रंग बदलते बदलते हैं, ढलते और फिर खिल उठते हैं, उसकी ज़ाहिर करने की कोशिश की गयी है। 





मेरी ज़िंदगी की किताब जब पूरी होगी
वो तेरे ज़िक्र के बिना अधूरी होगी
पढ़ना चाहूंगी मैं वो पन्ना
जहां मिला था तू मुझे तस्वीर मे
अजनबी की तरह
और घुल गया था मेरे जेहन-ओ-तन मे
रंग-ओ-रोशनी की तरह।

फिर तू मिला मुझसे
सर्दी की गुनगुनी धूप की तरह
मन हो गया सतरंगी
ओस की चमकती बूंद की तरह।

बात आगे बढ़ी मन बसंती हुआ
सपने खिलने लगे
ज्यों सरसों की क्यारियाँ...

सुनहरे ख़यालों से मन जुडने लगा
सपनों के रस्ते मन मुड़ने लगा 
हम मिलने लगे,
हर पहर मे, हर सहर मे 
कभी चंपई सुबह की तरह
कभी सिंदूरी शाम की तरह।

जब बात बढ़ी तो खयालात बदले
ज़िंदगी के सवालात मे उलझ कर
हालात बदले
और...
तू मुझसे रूठ गया
जेठ की दोपहरी की तरह...

उमंगों के सभी पत्ते गिर के
झुलस गए थे कोरों पर 
पर उम्मीद की एक बेपरवाह कली
लाल टेसू की मानिंद
अब भी खिली थी मन के पोरों पर
कि...
तू लौट आएगा एक दिन
मेरे बुलाने पर
और मिल जाएगा मुझसे
बरखा के बाद वाली
उजली धूप की तरह...

कहते हैं...
विश्वास का सूरज ही,
उम्मीद की कली खिलाता है
जीवन से दुश्वारियों का
कोहरा छांट ले जाता है
और...
इक रोज़ टेसू की कली फूल हुई
दुआ मेरे दिल की कुबूल हुई
हम तुम मिल गए फिर
सर्दी की धूप की तरह
मन सतरंगी हो गया
ओस की चमकती बूंद की तरह!


मंगलवार, 23 सितंबर 2014

तुम ही कहो...ऐसा होता है क्या...!!

अब आप सभी दोस्त मेरी कविताओं का लुत्फ़ इस तरीके से उठा सकते हैं।

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिये और सुनिए मेरी बिलकुल नयी कविता...."तुम ही कहो...ऐसा होता है क्या...!!

यह कविता मेरे दिल के बहुत करीब है। ज़िन्दगी ऐसी ही होती है दोस्तों...इसका ना कोई ठौर है ना कोई ठिकाना। बस कभी इस बस्ती कभी उस शहर। इसको किसी की परवाह नहीं होती...पर दिल बेचारा क्या करे...वो तो बीती यादों के सहारे ही अपने को पुराने गलियों-घरों-दरीचों में तलाशने में लगा रहता है...अब उसे कौन समझाए कि ज़िन्दगी बेवफा है...वो किसी का इंतज़ार नहीं करती...वो तो बस बहती जाती है अपनी रवानी में और पीछे छोडती जाती है यादों का काफिला और दिल बेचारा..
बस इतना ही पूछ पाता है....

घर का पता बदलने से
यादों का पता
बदल जाता है क्या
तुम ही कहो...
ऐसा होता है क्या

तो लीजिये सुनिए मेरी कविता...

http://soundcloud.com/meethi-boliyan/my-poetry-tum-hi-kaho-aisa

मंगलवार, 27 मई 2014

मैं, आज की सीता कहलाऊंगी

जानी-मानी पत्रिका 'बिंदिया' मे मेरी कविता का प्रकाशन, मेरे लिए सच मे बहुत सुंदर अनुभव रहा...जिसे मैं आप सभी के साथ साझा करना चाहूंगी...

ओ !! मेरी इच्छाओं के माया-मृग
तेरे मोह मे पड़ गया मेरा दृग,

तुम सोचोगे, मैं विचलित होकर
कर दूँगी प्राण को देह विलग॥
तो गलत सोच रहे हो जन्तु
कुछ ऐसा ना हो पाएगा,
सभी किन्तु-परंतु को दे विराम
नव-इतिहास रचाया जाएगा॥ 
मन धीर धरो’, ऐसा कह कर
सजल नयनों को ना बहलाऊंगी
तुझे पाने की इच्छा कर प्रचंड
मन को ये विश्वास दिलाऊंगी...

लक्ष्मण-रेखा उल्लंघन का लांछन
अब मुझसे ना होगा सहन,  
ढोंगी साधु के झूठे श्राप-पाप का  
छूत मुझसे ना होगा वहन॥  
चाहे भटकूँ मैं जंगल-जंगल
या फिर नदिया, ताल, समंदर,
तुझे ढूंढ लाऊँ सब मथ कर
हो चौदह-भुवन, या अवनि-अंबर
तो मेरी इच्छाओं के माया-मृग
तेरी मृगया पर, मैं स्वयं ही जाऊँगी
इस बार तुझे ढूँढने को वन-वन
अपने राम को ना भटकाऊँगी ।

अब इतनी भोली नादान नहीं
कि अपना भला ना समझ पाऊँ
किसी आढ़े-टेढ़े श्राप के भय से
व्यभिचारी की लंका मे फंस जाऊँ
अब कोमल तिनके की ओट मे बैठ   
नहीं विरह-वेदना मुझे सहन,
ना सामाजिक प्रतिष्ठा की वेदी पर
अग्नि-परीक्षा मे होना है दहन।  
ओ!! मेरी इच्छाओं के माया मृग
तुझे साधने, मैं स्वयं राम बन जाऊँगी
सीता-समाहित का विचार त्याग,
मैं, आज की सीता कहलाऊँगी॥